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ज़ियारत-ए-नाहिया: इमाम हुसैन (अ.स.) का वो खत जो कयामत तक ज़िंदा है

  • इमाम हुसैन (अ.स.) की नातियाँ और मरातिब: उनके उच्च पद, जन्नत के युवाओं के सरदार होने, और उनके आहलेबैत की विशेषता का वर्णन।
  • शहादत का दुखद चित्रण: कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन (अ.स.), उनके साथियों, और परिवार पर हुए ज़ुल्म, विशेष रूप से इमाम सज्जाद (अ.स.) और बीबी ज़ैनब (स.अ.) पर आई मुसीबतों का शोक व्यक्त किया गया है।
  • यज़ीदी फौजों के कृत्यों की निंदा: बच्चों का तश्ना-ए-लबी छोड़ना, ख़ैमा जलाना, और सरों को नेज़ों पर उठाने जैसे कृत्यों की कड़ी निंदा।
  • इमाम महदी (अ.त.फ.श.) का संबोधन: यह ज़ियारत इस बात का प्रमाण है कि इमाम ज़माना (अ.त.फ.श.) अपने परदादा हज़रत हुसैन (अ.स.) के गम में हमेशा ज़िंदा और शोक संतप्त रहते हैं।
  • अलविदा का मंजर: अंत में एक बहुत दर्दनाक भाग है जहाँ इमाम महदी (अ.त.फ.श.) कर्बला के शहीदों से विदा लेते हैं।

इसे पढ़ने का सबसे उत्तम समय "अरबाeen" (चेहल्लुम) माना जाता है, जो इमाम हुसैन की शहादत के ४० दिन बाद आता है। हालांकि, इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान से पढ़ा जा सकता है, लेकिन कर्बला में इमाम के रौज़े के बिल्कुल पास (नाहिया) खड़े होकर पढ़ने का विशेष महत्व है।

1. प्रस्तावना (Introduction)

Ziyarat E Nahiya In Hindi -

ज़ियारत-ए-नाहिया: इमाम हुसैन (अ.स.) का वो खत जो कयामत तक ज़िंदा है

इसे पढ़ने का सबसे उत्तम समय "अरबाeen" (चेहल्लुम) माना जाता है, जो इमाम हुसैन की शहादत के ४० दिन बाद आता है। हालांकि, इसे किसी भी समय और किसी भी स्थान से पढ़ा जा सकता है, लेकिन कर्बला में इमाम के रौज़े के बिल्कुल पास (नाहिया) खड़े होकर पढ़ने का विशेष महत्व है।

1. प्रस्तावना (Introduction)